Monday, June 10, 2013

ये ज़रूरी नहीं की कभी कह भी देते अपनी चाहतें ,,,,क्योंकि 
ज़ाहिर करने की एक और जुबान होती है तमन्नाओं की !!!!!
जिंदगी,
के खट्टे -मीठे पन्ने पलटने के बाद ये इल्म हुआ,. कि....जिंदगी एक चाहत, तमन्ना ,एक सपने ,छल ,उल्फत, नफरत ,एक शर्त के सिवा कुछ भी नहीं है,....
कोई मिला…कोई बिछुर गया,लेकिन जिसे भी शिद्दत से पाना चाहा,...करीब तक लाना चाहा,, वो’..या तो वो तकदीर के हाथों फिंसल. गया...या आने से पहले ही सिर्फ शर्तों के हाथों मुकर गया,,जैसे की अब लगता है..हर रिश्ते  के मामले में गरीब हो गए हम ???
कभी जिन्हे हकीकत में भी पाना चाहें वो ख्वाबों में  भी नहीं मिलते,....चाहे वो रिश्ते अपने हो या अपने बनाये हुए…???
और आजकल की जिंदगी’ तो जैसे शर्तों के अधीन हैं ,...शर्तों से ही जी जाती है क्योंकि ...बिना शर्तों के या तो ..रिश्ते बिखरते  हैं, या फिर खुदा और फ़रिश्ते मिला करते हैं....!!!
फिर भी ,..ना जाने…
सब जानते हुए भी,…उम्मीद्दों  से परे’ …
'किसको और क्यूँ,खोझ्ती रही,.और खोज रही हैं ये नज़रें ..जिस पर ये  दम निकले…..,
जबकि हर कोई अपनी मैं,….मुक्कद्दर,…और अपने साए.. के साथ,,,
तन्हा ही इस जीवन से चले !!!!

Monday, May 20, 2013

अपने.....
रिश्ते,...अपने इर्द-गिर्द के रिश्ते,... कुछ दूर के कुछ पास के…..सिर्फ हमारे.. लेकिन...,,,,,.....
जिंदगी भर कुछ अजीब सा ही रिश्ता रहा-सिर्फ अपनों से,...
बेवजह नफरत - कभी वजह न मिली, न अपनेपन का एहसास.!
किसी अपने के किये वो उम्मीद से परे वादों की ऋतु अलविदा हुई.....
हर बात  कहने - सुनने, रूठने - मनाने को जैसे चुप सी लग गयी.!!
मिलना- बात करना तो अब दिन के ख़्वाबों में  ही रह गए,,
वो दिल के रिश्ते तो बस अब यादों और कागजों में ही रह गए!
शायद जहाँ रिश्तों में गरमाहट और जटिलता ना हो,,,
वहां, अपने दिखते तो हैं, पर अपनापन नहीं दिखता ????
अब तो, जब कभी भी चोट और दर्द का एहसास होता है,...
तब यही लगता है कि, इस भीड़ में कोई अपना जरुर  है!!!
तो तुम सब अपनों को ‘अपना’ ना कहूं ‘तो और क्या कहूं??..
क्योंकि एक साथ इतने दर्द में भी... मुस्कुराना तक सिखा दिया.!!!!



Monday, May 13, 2013


आज सुबह की ख़ुशबू के एहसास से भरा हुआ दिन है,
पर क्यूँ हर दिन यही लगता, कि बस गुज़रा हुआ दिन है?
लगा कभी कि सिलवटों से भरी है सारी उम्मीदें,
और यूँ कि शिकन तक भी नहीं है एहसास में!!!
कुछ दूर उसके साथ चलते अचानक एक मोड़ पर, लगा,
अकेले अब कहाँ जाएँ, कि खुद भी हम अपने साथ नहीं!!
इश्क करने पर दिल को ये एहसास और इल्म हुआ है कि
दुश्मनी मेहरबान होकर निभती है,
दिल लगाने के बाद!!
इन गलियों में उम्मीद से परे ‘वो रात के सन्नाटे’,,,
मुझको इस बात का रोज़ एहसास दिलाते, कि.....
अब रोज़ कौन इस घर की देखभाल करे,,,
जहाँ जब चाहे ख़्वाब चूर चूर हो जाते !!!!!!!!!!!!!!!



Tuesday, May 7, 2013

ऐसा लगा आज कि ,अब  आँख बंद कर ,….
भरोसा किस पर करें ,हर शाख पे उल्लू बैठा है,,,,!!!!!!!!!
यूँ तो जिंदगी को गुजारने के लिए किसी बहाने की ज़रूरत नहीं होती,..क्योंकि खुशियों के चलते जो गम मिलते रहते  हैं, एक तजुर्बे के साथ गुज़र -बसर तो चलती ही रहती है..... लेकिन ख़ुशी के उन पलों पर एक गम का पल कब हावी हो जाता है,...एहसास ही नहीं होता,,,,,,तब भरोसा, दोस्ती,
मोहब्बत्त और रिश्तों में असल फर्क का इल्म महसूस होता है,  ...लगता है अब सब अफसाने झूठे हैं, सिर्फ एक हकीकत के सिवा!!!!!!!
दुनिया में उम्मीद से परे  ,कोई "एक अपना" ढूँढते ढूँढते,भी
कब  लोग  दिलों से  खेल कर, यूँ ही गुम हो जाते  हैं,,,!??,
.,,,
और;,
फिर उन्ही रंजिशों ,खलिश, हसरतों और दर्द के साथ .....,
जिंदगी न तो गुज़रती है और न ही बसर हो पाती है.,लेकिन ..
फिर भी रह जाते हैं जाने अनजाने,,,भूले-बिसरे कुछ चेहरे,,
और कहीं कोई एक शख्स ,सिर्फ ज़ुबानी किताब की तरह,,,,, !
कि..,कोई तन्हाई में गर हाल-ए-दिल पूछे भी ले तो ....,.
उस पल भरी पलकों के साथ खुद को बिखरा सा पाया है !!!!