Monday, March 8, 2021


आज ना जाने कैसे हक़ीक़त से मुलाक़ात हुई...;

पहले कुछ बात हुई …..फिर कुछ आग़ाज़ हुई !
ऐसा लगा तन्हाई में वो,'गुलज़ार की उस खोई इलायची-सा;
जिसे शायद हम कहीं बे-तक्क्लुफ़ी में रख के भूल गए ,,,
वो जिसके मिलने से हुई खोये हुए अल्फ़ाज़ों में हलचल..;
वो जो ठहरी उस नमी पे यूँ गुज़र जाए....!
खुदा' जाने कौन सी कशिश दिखी दिन की गुफ्तगु में..,
खुद से भी छेड़ा ज़िक्र ,तो ख़ामोशियाँ  ख़ूब  इतरायीं .!
अभी बे-ख़्याली,बहुत अगर-मगर,क़ाश के साये में है मेरे वो;
दिमाग की ख़लिश लिए, कभी लगता है इक ताबीर-सा वो,
यूँ जो सुनाया हमने  गुज़रा रूदाद-ए-सफर…,
कह रहा है  दिल  'उम्मीदों से परे, ये आज..,
....कब हम संवर जाए और ये अश्क सिमट जाएँ..!!!

           Happy Woman’s DayJ

Friday, March 20, 2020


मैं अब कुछ कहने से डरने लगा हूँ        
शब्द….,जो ज़हन में रखकर
करते रहते हैं हलचल,,,
हलचल एक उस बहती नदी की तरह
कितना शोर होता है उसमें,,,,,
उस शोर से डरने लगा हूँ।।।।
मैं अब कुछ कहने से क़तराने लगा हूँ
बिना कहे भी तो बहुत कुछ होता है
जो चुपचाप अंदर बहता है
जिसमें बीती हवाओं की रुख़ से,
...एक हरी-सी शाख़ रहती है;
चुपचाप उस हवा की खुशबु तरह शांत,सोम्य,
जो सिर्फ,एक यकीं ,एक एहसास लिए ..;
...
आँखों में,,नूर  दे जाता  है
नूर,‘एक  सुकून का,'एक अनकही ख़ामोशी का;
'उम्मीदों से परे, तमाम लकीरों के इज़ाफ़े लिए 
फ़िर , अब शब्दों से ही होगा सिर्फ खेलना,,,
क्यूंकि,मैं अब कुछ कहने से डरने लगा हूँ…..!!!

Monday, October 26, 2015

उसने कहा था..........;
कुछ तो कहा ही था ना उसने
वो एक ज़ज़्बा, एक हौसला लिए,,,!!;
जिसको हकीकत में  लिए,,;
एक  हाथ आगे,,, 'भरोसा,,,,एक तमन्ना,,,,;
उस तर्क-ए-ताल्लुक़ के साथ,,,‘एक तक़ाज़ा लिए,;
ख्वाइशों के पर लगाए ,,;
अपने ख्यालों,,,अपने यकीं से बढ़ा,,,,!!
या फिर सिर्फ एक मरीचिका भरम लिए;,,;
सिर्फ कोई एक ही आगे बढ़ा ,,,,??
बिना उसकी जाने ;,,,
जो सच में क्या ठाह थी उसकी ,;?    
'कि वो चाहता तो था ,,,’मगर हौसला ना था उसका ,,;
वो जो कुछ, कभी 'उम्मीदों से परे',,,
. मुझसे....‘उसने कहा था??,,

Wednesday, August 12, 2015

बीते दिनों से वो सिमटे अलफ़ाज़ नहीं मिल रहे थे,
कोई तर्क, कोई हलचल नहीं...
रही तो बस! एक बेचैनी , एक पूर्ण विराम...!
....उस खुले दरवाज़े की तरह..;
ड्योढ़ी पे नज़रें जहाँ दायें-बाएं रखी रही कई सालों से
वो खुला दरवाज़ा आज तलक ना ढुकाया हमने,
बरसों कानों को एक आहट सुनने का इंतज़ार रहा;
...'आज एक और सामान बंधा...;
मुक़ाम पे अपने लिए कर गुज़रने को तैयार हुआ वो
‘वो जो फ़ागुन में बौछारों की तरह साथ रहा मेरे..  
एक सर्द-गर्म  की धूप छाँव  लिए
हज़ारों यादें गुज़रे सालों की अब सिरहाने छोड़े
तमाम ख्वाइशों की मुठ्ठी को उस दहलीज़ पे  लिए ..,
वो जहाँ से बरसों से हवा आर-पार हो रही थी...
आज वहीँ तैयार खड़ा है वो...
आज मन नहीं है मेरा...;
फिर भी हाथ पकड़,..मंज़िल को रुख किया ..;
..'कहा...'मुड़ कर देखते रहना इस पार..;
‘कि जब भी इस राह से गुज़रूँगा..,
.....'हरदम ये नम आँखें,,, रुकी जुबां..
'एक कसक,,'उम्मीदों से परे एक एहसास दिलाती रहेगी..,
.............इस खुले दरवाज़े का....!!!